भानुप्रतापपुर: गोदावरी माइंस में माइनिंग नियमों की उड़ीं धज्जियां! बिना रॉयल्टी-पास के बाहर खपाया जा रहा डस्ट मटेरियल, गंभीर खतरे में पर्यावरण
रॉयल्टी चोरी और नियमों की अनदेखी की आशंका

भानुप्रतापपुर / संतोष गर्ग
कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर क्षेत्र में स्थित गोदावरी माइंस (कच्चे) एक बार फिर बड़े विवादों के घेरे में आ गई है। हाल ही में माइंस परिसर में डस्ट (खनन अपशिष्ट/धूलयुक्त मटेरियल) धंसने की एक बड़ी घटना सामने आई थी। इस हादसे के बाद अब माइंस प्रबंधन पर डस्ट मटेरियल के अवैध परिवहन और डंपिंग को लेकर बेहद गंभीर आरोप लग रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि धंसे हुए इस डस्ट को रफा-दफा करने के लिए नियमों को ताक पर रखकर बिना किसी अनुमति के बाहर भेजा जा रहा है।

क्या है पूरा मामला? (The Big Issue)
स्थानीय सूत्रों और ग्रामीणों से मिली जानकारी के मुताबिक, माइंस परिसर से हर दिन भारी मात्रा में डस्ट मटेरियल निकाला जा रहा है। नियमों के मुताबिक किसी भी माइनिंग वेस्ट या मटेरियल को बाहर ले जाने के लिए खनिज विभाग की लिखित अनुमति, रॉयल्टी भुगतान और ट्रांजिट पास (TP) का होना अनिवार्य है।
लेकिन आरोप है कि गोदावरी माइंस से निकलने वाले इस डस्ट को बिना किसी वैध दस्तावेज के चोरी-छिपे माइंस क्षेत्र से बाहर ले जाकर आसपास के इलाकों और निकटवर्ती गांवों में डंप किया जा रहा है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह सीधे तौर पर खनिज परिवहन, भंडारण और रॉयल्टी चोरी का बड़ा मामला हो सकता है, जिसकी पुष्टि विभागीय जांच के बाद ही होगी।
पर्यावरण और जनता की सेहत दांव पर
इस बेतरतीब और अवैध डंपिंग को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों ने लाल झंडी दिखा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि खुले आसमान के नीचे इस तरह डस्ट फेंकना आने वाले समय में एक बड़ी त्रासदी को न्यौता दे रहा है:
सांस की बीमारियां: डंप किए गए स्थानों से उड़ने वाली बारीक धूल हवा में घुलकर साइलेंट किलर बन रही है, जिससे ग्रामीणों में श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
बंजर हो रही कृषि भूमि: तेज हवाओं के साथ यह धूल उड़कर आसपास के खेतों पर जम रही है, जिससे फसलों को भारी नुकसान पहुंच रहा है।
दूषित हो रहे जल स्रोत: बारिश या हवा के जरिए यह डस्ट मटेरियल स्थानीय नदी-नालों और जल स्रोतों में मिल रहा है, जिससे पानी पीने लायक नहीं रह जाएगा।
दुर्घटनाओं का डर: बिना किसी वैज्ञानिक तरीके या सुरक्षा मानकों के किए जा रहे इस डंपिंग से भूमि क्षरण (जमीन धंसना) और सड़कों पर हादसों की आशंका लगातार बनी हुई है।
मौन बैठे जिम्मेदार: खनिज, वन और राजस्व विभाग पर उठे सवाल
इस पूरे मामले ने प्रशासन की निगरानी व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। क्षेत्रवासियों का सीधा सवाल है कि जब इतने बड़े पैमाने पर माइनिंग नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, तो स्थानीय खनिज विभाग, वन विभाग और राजस्व अमला आंखें मूंदकर क्यों बैठा है? गाड़ियों के अवैध परिवहन पर अब तक कोई नाकेबंदी या जांच क्यों नहीं की गई?
ग्रामीणों की चेतावनी: क्षेत्र के नागरिकों ने साफ कर दिया है कि अगर प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया और पूरे खेल की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं की, तो ग्रामीण सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन के लिए मजबूर होंगे।
अब देखना यह होगा कि भानुप्रतापपुर प्रशासन इस खबर के सामने आने के बाद क्या कदम उठाता है, या फिर हमेशा की तरह मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।




